सहीराम
कायरों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही चली जा रही थी। हालांकि खुद कायर ऐसा नहीं चाहते थे कि उनकी संख्या बढ़े। वे कोई साधु-संत
तो थे नहीं, जिनके बारे में एक हरियाणवी कहावत यूं है कि मोडा अपणा ही पंथ बढ़ावै। वे कोई भाजपाई जमात भी नहीं थे कि मिस
कॉल तक से अपने संदस्यों की संख्या बढ़ाने में लगे रहें। कायरों की दिनों-दिन बढ़ती इस संख्या को देखकर बहादुरों के दिल में शोले
धधक रहे थे और उनकी बाजुएं फड़कने रही थी। पर बाजुएं फड़काने का फायदा कोई नहीं हुआ। क्योंकि हाथ में तलवार ना हो तो बाजुओं
का फड़कना, आंख फड़कने से ज्यादा महत्व नहीं रखता।
पर तलवार नहीं तो क्या, उनके पास जुबान तो थी। सो तलवार की बजाय वे कायरों के खिलाफ जुबान ही चलाने लगे। जुबान के बारे में
कहा जाता है कि उसमें कोई हड्डी तो होती नहीं, सो उसे चाहे कैसे ही पलट लो। इससे जुबान से फिरनेवाले आखिर में विजयी साबित
होते हैं और जिसे मर्द की जबान वगैरह कहा जाता है उसकी पोल खुल जाती है और वे पिट जाते हैं। वैसे भी जमाने में यह कहावत तो
मिलती है कि कलम तलवार से ज्यादा मार करती है, पर जुबान तलवार से ज्यादा काम कर जाए, ऐसी कोई कहावत नहीं मिलती।
अलबत्ता यह जरूर कहा जाता है कि तलवार का घाव भर जाता है,पर जुबान का दिया घाव नहीं भरता। भाई ज्यादा प्राब्लम हो तो
डायबिटीज वगैरह चैक करा लेना चाहिए।
वैसे बताते हैं कि पहले तलवार ज्यादा कारगर ढ़ंग से चलानेवालों को ही राज मिलता था, पर आजकल राज उनको मिलता है जिन्हें
जुबान ज्यादा कारगर ढ़ंग से चलानी आती है। इधर के चुनावों में यह साबित भी हो गया कि जुबान चलानेवालों से कलम चलानेवाले भी
हार जाते हैं। पर ऐसा भी नहीं है कि इन जुबान चलानेवालों को तलवार चलानी नहीं आती। गुजरात के दंगों में वे यह साबित कर चुके हैं
कि झुंड में हों तो ये तलवार, छुरे वगैरह भी खूब चला सकते हैं।
खैर बहादुरों ने मौका देखा और उन्होंने तलवार चलाने की बजाय जुबान के कारगर हथियार का ही इस्तेमाल किया और वे कायरों की
लानत-मलानत करने लगे। बात बढ़ती देखकर एक दिन प्रदेष के कायरों का एक प्रतिनिधिमंडल बहादुरों के सिरमौर बनने की कोशिश कर
रहे मंत्री महोदय के पास जा पंहुचा। पर आश्चर्य किंतु सत्य की तरह मंत्रीजी ने उनके आने का सबब जानने से पहले ही उनकी प्रषंसा
करनी षुरू कर दी। बोले-तुम बहादुर हो। जैसे वे उन्हें अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए बहला-फुसला रहे हों। पर कायर उन पार्टियों
के नेताओं की तरह तो थे नहीं, जो चुनाव के वक्त फिसलकर उन्हें फुसलानेवाली बहादुरों की पार्टी में चले गए थे। शायद इसीलिए कायरों
के प्रतिनिधिमंडल को कुछ समझ में नहीं आया।
पर जी-कायरों के प्रतिनिधिमंडल ने कहा-आप तो कह रहे थे कि हम कायर हैं। हमें भी यह सुविधाजनक लगा तो हमने भी मान लिया
था कि हम कायर हैं। पर अब जब मैं कह रहा हूं कि तुम बहादुर हो, तो तुम्हें अब भी बिना चूं-चपड़ किए यह भी मान लेना चाहिए कि
तुम बहादुर हो। अच्छा बताओ किसलिए आए? जी जब आपने हमें कायर कहा तो कायदे से तो हमारा खून खौलना चाहिए था, वैसे ही
जैसे जब आप हिंदुओं को कायर कहते हैं तो उनका खून खौलने लगता है। बहादुर मंत्री ने सोचा चलो लाइन पर आ रहे हैं। उन्होंने कहना
चाहा कि हम तो हिंदुओं को कायर कहते ही इसलिए हैं कि उनका खून खौले और हम अगला नारा लगा सकें-जिस हिंदू का खून ना
खौले, खून नहीं वह पानी है।
पर कायरों ने बहादुर मंत्री को कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया। यूं कहने को यह भी कहा जा सकता है-खून है यार, चाय तो है नहीं,
कितना खौलाओगे। और यह कोई चाय पर चर्चा भी नहीं थी। फिर हाई बी पी की शिकायत लोगों में वैसे ही बहुत बढ़ती जा रही है। खैर,
कायर कह रहे थे- तो जी, जब आपने हमें कायर कहा तो हमें बड़ी षर्म आयी-कायरों ने एक सुर से कहा-हमने सोचा लानत है हमारे
कायर होने पर। बहुत सोच-विचार के बाद हमने तय किया कि चलो चलकर आपसे बहादुरी का नुस्खा पूछते हैं और बहादुर हो जाते हैं।
पर अब तो आपने खुद ही मान लिया कि हम बहादुर हैं तो अब जरूरत नहीं रह गयी है बहादुरी का नुस्खा जानने की। फिर भी अगर
आप बता दें कि आप बहादुर कैसे बनें तो यह नुस्खा हमारे आगे कभी काम आ सकता है। तो जरा बताइए ना सीने को फुलाकर छप्पन
इंच का कैसे किया जा सकता है?
बहादुरी का नुस्खा-मंत्री महोदय को हंसी आ गयी-बहादुरी का क्या नुस्खा होगा! और छप्पन इंच का सीना लेकर तुम्हें कौन सा प्रधानमंत्री
बनना है! जी नुस्खा तो जरूर होगा-कायरों ने कहा-क्योंकि थोड़े ही दिन पहले आप खुद ही कह रहे थे कि मैं तो एक बेचारा सा मंत्री हूं-
स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू नहीं कर सकता। पर फिर जब आपने हमें कायर कहा तो हमें लगा कि आपके पास जरूर कोई नुस्खा
है जो इतनी जल्दी आप इतने बहादुर बन गए। हालांकि अब छप्पन इंचवालों का सीना भी छप्पन इंच का कहां रहा! दिखाई तो नहीं
देता।
बहादुर मंत्री को इस बात पर गुस्सा तो बहुत आया कि जब उनकी बहादुरी के इतने चर्चे हो रहे हैं तब भी ये लोग उनके बेचारेपनवाला
बयान याद दिलाना नहीं भूल रहे और प्रधानमंत्री के छप्पन इंचवाले सीने पर सवाल उठा रहे हैं। पर फिर उन्होंने जज्ब किया और बोले-
बहादुरी का ऐसा कोई नुस्खा नहीं होता। हालांकि वे चाहते तो यह कह सकते थे कि मेरी पार्टी में आ जाओ और इंस्टेंटली बहादुर बन
जाओ-इंस्टेंट कॉफी की तरह। पर कायर तो जैसे नुस्खा पाने पर अड़े हुए थे, जैसे उन्हें बहादुरी का नुस्खा नहीं किसी खजाने की चाबी
मिलनेवाली थी।
सो वे बोले-नहीं जी ऐसा कैसे हो सकता है,नुस्खा तो जरूर होगा। वैसे अगर आप हमें वक्त पर यूरिया दे देते तो हम बहादुर हो सकते
थे। हमारी कपास खरीद लेते, धान खरीद लेते तो हम बहादुर हो सकते थे। पर आपने हमें बहादुर बनने का मौका दिया ही नहीं। हमें
लगा कि शायद बहादुर बनने का आपका नुस्खा यह है ही नहीं।
कायर बता रहे थे-तो सही नुस्खा तलाशने के लिए हम मिस कॉल देकर आपकी पार्टी के सदस्य भी बने। हमें लगा कि षायद यही वह
नुस्खा हो। क्योंकि आपकी पार्टी में तो सब बहादुर ही बहादुर हैं। हमेषा देषभक्ति-देषभक्ति रटते रहते हैं, विरोधियों को देषद्रोही बताते
रहते हैं, हमेषा पाकिस्तान और चीन को ललकारते रहते हैं। इस पर बहादुर मंत्री ने कहना चाहा कि बेवकूफो ऐसा हम सिर्फ विपक्ष में
रहकर ही करते हैं। राज आने के बाद तो हमने सबसे पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को ही आमंत्रित किया और चीनी राष्ट्रपति को तो
हमने साबरमती के तट पर झूला झुलाया और अब हमारे प्रधानमंत्री खुद वहां झूला झूलने गए हैं। मतलब व्यापार की बात करने गए हैं।
पर यह बात उन्होंने कही नहीं। सोचा यह उंची राजनीति इनके पल्ले थोड़े ही पड़ेगी।
उधर कायरों का प्रतिनिधिमंडल कह रहा था-पर जी मिस कॉल से आपकी पार्टी की सदस्यता लेकर भी बात कुछ बनी नहीं। सो
पाकिस्तान और चीन की सीमा पर तो अपने बच्चों को भेज दिया और खुद रामजी-रामजी रटते रह गए। पर राम भी राजी ना हुआ और
नाराज होकर हमें पीट और गया। कभी बारिश की मार मारी, कभी ओलों की और हम रह गए कायर के कायर। अब लगता है कि कोई
और नुस्खा होगा बहादुर बनने का। बताइए ना क्या है वो नुस्खा-कायर पूछ रहे थे। नहीं, नुस्खा तो कोई नहीं है-बहादुर मंत्रीजी अब
सचमुच परेशान होने लगे थे। उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। नहीं होगा तो जरूर-कायर कह रहे थे- पर आप उसे सात तालों में
बंद करके रखे हुए हैं। पर वह काला धन थोड़े ही है, जो सात तालों में बंद करके रख रहे हैं। वैसे जी अगर आप काला धन विदेश से
लाकर अगर पंद्रह-पंद्रह लाख हमारे खाते में जमा करा देते, जैसा कि प्रधानमंत्री ने वादा किया था तो हम तुरंत बहादुर बन जाते। पर
लगता है वह नुस्खा तो आप ही भूल गए। फिर भी कोई और नुस्खा होगा बताइए ना क्या है वो नुस्खा?
नहीं नुस्खा क्या है-बहादुर मंत्री ने कहा-रही काले धन की बात तो चुनावों में ऐसी बात कही ही जाती है, हमारे अध्यक्षजी ने कह तो
दिया। देखो जी-कायर कह रहे थे-हमने अपनी तरफ से यह नुस्खा तलाशने की बड़ी कोषिष की। पर हमारे बच्चों ने बताया कि गूगल देव
भी यह नुस्खा नहीं बता पा रहे। तो हमने सोचा जैसे आपने गुजरात में बहादुरी दिखाई थी, थोड़े दिन पहले मुजफ्फरनगर में दिखाई थी
और भी वक्त-वक्त पर जगह-जगह आप दिखाते ही रहते हैं, क्यों ना वही नुस्खा हम भी आजमा लें। पर फिर हमें लगा कि हम यह
नुस्खा आजमा कर किस पर अपनी बहादुरी दिखाएं। जिन पर आप दिखाते हों तो वे भी बेचारे हम जैसे ही हैंःगरीब-गुरबा और लुटे-पिटे
लोग। उनकी यह दलील सुनकर बहादुर मंत्री को बड़ा गुस्सा आया-मौका चूक गए ना कमबख्तो! अगर यह काम कर देते तो मेरे भी नंबर
बढ़ जाते, जैसे संजीव बालियान के बढ़े। पर बहादुर मंत्री अपने गुस्से को दबा गए।
उधर कायर कह रहे थे-वैसे यह नुस्खा क्या है-नफरत ही है ना! आप भी नफरत फैलाओ, हम भी नफरत फैलाएं, फिर तो नफरत ही
नफरत हो जाएगी। सो हमने इरादा छोड़ दिया। फिर सोचा आपकी पार्टी के सांसदों और मंत्रियों की तरह अपने विरोधियों को गालियां देने
लगेंगे तो अवष्य ही उन्हीं की तरह बहादुर बन जाएंगे। पर हम किसे गालियां देते। हम ना तो महंत आदित्यनाथ हैं, ना साध्वी निरंजन
ज्योति।
हम तो गृहस्थ हैं-कायर कह रहे थे-हम कोई साधु-संत थोड़े ही हैं। फिर साधु- संत भी आपकी पार्टीवालों जैसे जिन्हें रामजी की उतनी
चिंता नहीं, जितनी सत्ता की है। बल्कि हम तो जी गिरिराजसिंह जैसे भी नहीं हैं कि विरोधी पार्टीवालों को गाली देने लगें। सो अपने को,
अपने बीबी-बच्चों को और अपनी सरकार को ही कोसने लगे। क्या? सरकार को कोसने लगे? हां जी, और क्या करते! पर हम सच
बताएं जी हम आपके अरूण शौरीजी और जेठमलानीजी जैसे बहादुर तो नहीं हैं ना कि अपनी सरकार की ही धज्जियां उड़ाकर रख दें। सो
बस मन ही मन कोस कर रह गए। बहादुर मंत्रीजी एकदम बिफर उठे-सरकार को कोसते हो और बहादुरी का नुस्खा पूछने मेरे पास आते
हो। भागो यहां से कायरो और जाओ मरो! अचानक कायर खुशी से उछल पड़े-मिल गया-मिल गया! क्या-बहादुर मंत्रीजी एकदम
आश्चर्यचकित थे। बहादुरी का नुस्खा मिल गया-कायरों ने कहा-और क्या!
सहीराम

