अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने में मुसलमान सबसे आगे थे
इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों ने राष्ट्रीय आंदोलन में जबरदस्त भूमिका निभाई। वे देशभक्त और समर्पित लोग थे और इसलिए उन्होंने भारत का शोषण करने वाली विदेशी ताकतों को बाहर खदेड़ने के लिए कठिन संघर्ष किया। राष्ट्रीय आंदोलन के वस्तुगत अध्ययन से यह पता चलता है कि राष्ट्रवादी जन उभार में मुसलमान कभी पीछे नहीं रहे। भारत की आजादी के लिए वह दूसरे समुदाय के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े। गृह मंत्रालय की फाइलें उनके बलिदानों से भरी पड़ी हैं, जिनके चलते 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा।
हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान ढक्कन (दक्षिण भारत) में अंग्रेजों के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए 18 वीं सदी में उठ खड़े हुए। बंगाल के फकीरों की बगावत तथा फराइजी और
वहाबी आंदोलन ने भारत में अंग्रेजी राज के विस्तार की शुरुआती योजना की रफ्तार को अस्त - व्यस्त कर दिया था। खिलाफत आंदोलन ने भारत में अंग्रेजी राज के खिलाफ भारी तादाद में मुसलमान को लड़ाकू बनाने में प्रगतिशील भूमिका निभाई । राष्ट्रवाद को बढ़ाने में इस आंदोलन ने सकारात्मक भूमिका निभाई। अंग्रेजों के खिलाफ घृणा और क्रोध की चिंगारी 1857 में एक बार फिर फूट पड़ी। इस बार यह महज किसी एक समूह की बगावत नहीं थी बल्कि पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ एक जन विद्रोह था जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है।
उल्लेखनीय है कि 1857 तक आजादी का कारवां लगभग पूरी तरह मुसलमानों के नेतृत्व में चला। चूंकि सत्ता मुसलमानों से छीनी गई थी, इसलिए
स्वाभाविक रूप से विजातीय सरकार के पहले नंबर के दुश्मन थे। सुभाष चंद्र बोस को की सेना - आईएनए में बहुत सारे मुसलमान भर्ती हुए ।
जब गांधी जी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनता से समर्थन हासिल करने के लिए भारत का दौरा कर रहे थे, तब कई मुसलमानों ने काफी पैसे और गहने चंदे में दिए। यह सच है कि भारी संख्या में मुसलमान समय- समय पर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और उन्होंने यादगार भूमिका निभाई। अलीगढ़ और रोहेलखंड में आमतौर पर मुसलमान जन उभार में शामिल थे। जालियांवाला बाग नरसंहार में अनेक मुसलमानों ने अपनी जान न्योछावर की। डॉक्टर सैफुद्दीन, किंचलू और डॉक्टर सत्यपाल उसे सभा के नेता थे और डॉक्टर बशीर मुख्य अतिथि थे।
इसी तरह उर्दू भाषा में स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उर्दू के शेयरों साहित्यिक विद्वानों पत्रकारों वक्ताओं और देश ने स्वाधीनता आंदोलन के उद्देश्य का प्रचार प्रसार किया और अनब्लॉक जैसे प्रकाशन स्वतंत्रता आंदोलन के अंक थे मां ने बंगाल के हर जिले का दौरा किया तथा हिंदू मुस्लिम एकता और स्वाधीनता आंदोलन के महत्व पर तकरीर की। मजलिस अशरफुल इस्लाम खुदाई खिदमतगार सिया पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस और ऐसे दूसरे मुस्लिम संगठनों ने राष्ट्रीय आंदोलन को अपना समर्थन दिया।
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